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    एक नजर में जानिए देश में कब-कब शिक्षा को लेकर किए गए बड़े बदलाव, ये भी थे अहम बदलाव

    नई दिल्‍ली (जेएनएन)। सदियों से अपने ज्ञान और अध्यात्म का प्रकाश फैला रहे भारत को दुनिया का विश्व गुरु कहा जाता रहा। तमाम सभ्यताएं पठन-पाठन के हमारे ही बताए रास्ते पर चलती दिखीं। परंपरावादी शिक्षा: शुरुआती दौर में भारत में ब्राह्मण परिवार शिक्षा देते थे। मुगलों के समय में शिक्षा संभ्रांतवादी विचारधारा के अधीन थी।
    ब्रिटिश शिक्षा तंत्र: ब्रिटिश शासन ने आधुनिक राज्य, अर्थव्यवस्था और आधुनिक शिक्षा तंत्र को बढ़ावा दिया।नेहरू और शिक्षा: बेहतर शिक्षा के लिए देश में आइआइएम और आइआइटी जैसे उच्च शिक्षण व तकनीकी संस्थानों की नेहरू ने परिकल्पना की।
    कोठारी समिति: 1964 में गठित कोठारी समिति ने देश के चहुंमुखी विकास के लिए निशुल्क शिक्षा और 14 वर्ष तक के बच्चों को अनिवार्य शिक्षा को अहम माना। भाषाओं को और विकसित करने तथा विज्ञान की पढ़ाई को भी महत्तवपूर्ण माना।
    ओॅपरेशन ब्लैकबोर्ड: 1987-88 में इसका उद्देश्य प्राइमरी स्कूलों में विभिन्न संसाधनों को बढ़ाना था।
    शिक्षकों की शिक्षा: 1987 में शिक्षकों की शिक्षा के लिए संसाधन बढ़ाए गए।
    बच्चों को पौष्टिक आहार: 1995 में उपस्थिति बढ़ाने के लिए ताजा पौष्टिक भोजन मुहैया कराया जाने लगा।
    मौलिक अधिकार: 2001 में देश में 6-14 साल के बच्चों को निशुल्क और अनिवार्य रूप से शिक्षा लेने को मौलिक अधिकार का प्रावधान दिया गया।

    पुरानी नीतियों में खास
    राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 1968 
    पहली शिक्षा नीति 1968 में आई। यह कोठारी आयोग (1964-1966) की सिफारिशों पर आधारित थी। इसमें शिक्षा को राष्ट्रीय महत्व का विषय घोषित किया गया। 14 वर्ष की आयु तक के बच्चों के लिए अनिवार्य शिक्षा के साथ शिक्षकों के बेहतर प्रशिक्षण और योग्यता का लक्ष्य रखा गया। संस्कृति और विरासत के अनिवार्य हिस्से के रूप में संस्कृत भाषा के शिक्षण को प्रोत्साहित किया गया। इसमें व्यय के लिए बजट के 6 फीसद का लक्ष्य रखा गया।  माध्यमिक स्तर पर ‘त्रिभाषा सूत्र’ को लागू किया गया।
    राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 1986
    इसे असमानताओं को दूर करने के लिए जाना जाता है। इसका उद्देश्य विशेष रूप से भारतीय महिलाओं, अनुसूचित जनजातियों और अनुसूचित जाति समुदायों के लिए शैक्षिक अवसर की बराबरी पर विशेष जोर देना था। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय के साथ ‘ओपन यूनिर्विसटी’ प्रणाली का विस्तार। महात्मा गांधी के दर्शन पर आधारित ‘ग्रामीण विश्वविद्यालय’ मॉडल निर्माण का आह्वान किया गया। इसका उद्देश्य ग्रामीण भारत में जमीनी स्तर पर आर्थिक और सामाजिक विकास को बढ़ावा देना था।
    राष्ट्रीय शिक्षा नीति में संशोधन, 1992
    राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 1986 में संशोधन के उद्देश्यों में सबसे प्रमुख उद्देश्य देश में व्यावसायिक और तकनीकी कार्यक्रमों में प्रवेश हेतु राष्ट्रीय स्तर पर एक आम प्रवेश परीक्षा का आयोजन करना था। इंजीनियरिंग और आर्किटेक्‍चर कार्यक्रमों में प्रवेश के लिए राष्ट्रीय स्तर पर संयुक्त प्रवेश परीक्षा (जेईईऔर अखिल भारतीय इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा (एआइईईई) तथा राज्य स्तर के संस्थानों के लिए राज्य स्तरीय इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा (एसएलईईई) निर्धारित की गई। इसने इस विधा के छात्रों के लिए काफी सहूलियत पेश की।