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    नई शिक्षा नीति ( New Education Policy ) में स्थानीय भाषाओं में पठन पाठन की व्यवस्था की बात, फिर भी यूपी बोर्ड में क्षेत्रीय भाषाओं की हालत पतली

    प्रयागराज : यूपी बोर्ड की हाईस्कूल और इंटरमीडिएट की परीक्षाओं में क्षेत्रीय भाषाओं की हालत बहुत खराब है। हाईस्कूल में 21 भाषाओं में तीन में एक भी विद्यार्थी ने पंजीयन नहीं करया। इंटरमीडिएट में शामिल 20 भाषाओं में से तीन भाषाओं में पंजीयन शून्य रहा।
    हाल ही में केंद्र सरकार ने नई शिक्षानीति घोषित की जिसमें स्थानीय भाषाओं में पठन पाठन की व्यवस्थ देने की बात कही। उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा परिषद के 2020 के हाईस्कूल और इंटरमीडिएट के परीक्षा परिणामों पर नजर डालें तो कई भारतीय भाषाओं में अभ्यर्थियों की संख्या शून्य हो चुकी है।

    हाईस्कूल के नतीजों के अनुसार गुजराती भाषा में 43 विद्यार्थी पंजीकृत हुए, मात्र दो छात्र पास हो सके। बंगला में 11 छात्र पंजीकृत हुए। मराठी में दो विद्यार्थी पंजीकृत हुए लेकिन पास नहीं हुए। उड़िया में दो पंजीयन हुआ, एक ही विद्यार्थी पास हो सका। कन्नड़ में एक पंजीयन हुआ वह भी अनुत्तीर्ण रहा। कश्मीरी भाषा में 35 पंजीयन हुआ, सिर्फ पांच लोग पास हुए। सिंधी में 77 पंजीयन हुआ। पास होने वालों की संख्या 49 रही। तमिल में दो विद्यार्थी पंजीकृत हुए एक उत्तीर्ण हो सका। तेलगू में 11 पंजीयन हुआ लेकिन कोई भी पास नहीं हुआ। मलयालय, नेपाली, आसामी में एक भी विद्यार्थी ने पंजीकरण नहीं कराया।

    इंटरमीडिएट में गुजराती में तीन पंजीयन हुए और एक उत्तीर्ण हुआ। बंगला में 11 पंजीयन तो छह उत्तीर्ण हुए। कन्नड़ में 20 में से दो पास हुए। सिंधी में 27 में से 18 लोग पास हुए। तमिल में आठ व तेलगू में एक पंजीकरण हुआ लेकिन कोई भी पास नहीं हुआ। मराठी, आसामी व मलयालम में एक भी विद्यार्थी ने पंजीकरण नहीं कराया। उड़िया में एक और नेपाली में दो पंजीकरण हुआ लेकिन पास कोई भी विद्यार्थी नहीं हुआ।

    ’>>नई शिक्षानीति में स्थानीय भाषाओं में पठन पाठन की व्यवस्था की बात

    ’>>12 वीं में मराठी, आसामी,मलयालम का परीक्षा परिणाम शून्य

    कॉलेजों में शिक्षक न होने से विद्यार्थियों की संख्या शून्य हो चुकी है। मेरे कॉलेज में उर्दू, अरबी, फारसी के शिक्षक हैं। उनके विद्यार्थी भी पंजीकृत हैं।

    देवेंद्र सिंह, प्रधानाचार्य, जीआइसी

    काफी समय से क्षेत्रीय भाषाओं की तरफ से लोगों का रुझान खत्म हो रहा है। विद्यालयों में इन भाषाओं के अध्यापक भी नहीं हैं जिससे विद्यार्थी भी नहीं हैं।

    इंदू सिंह, प्रधानाचार्य, जीजीआइसी